मनमोहन सिंह
डगशाई की यह जेल अपने अंदर एक बहुत लंबा इतिहास समेटे है। इसमें वे कहानियां दफन है जिनका ज़िक्र तक भी अब नहीं होता। इसके साथ ही इसकी दीवारें अंग्रेजों के ज़ुल्म- ओ- सितम की दास्तां भी बयान करती हैं।
19 वीं सदी आते आते देश भर में अंग्रेज़ी हुकूमत के खिलाफ आक्रोश बढ़ने लगा। नर्म दल और गर्म दल के लोग अपने अपने आंदोलन चलाने लगे। पंजाब गदर पार्टी भी इसमें शामिल थी। वे लोग हथियारबंद इंकलाब की बात कर रहे थे। अंग्रेजी सरकार हर तरह से उन्हें कुचलने में लगी थी। इसी विद्रोह की चिंगारी अंग्रेज़ी सेना में भर्ती भारतीय सैनिकों तक भी जा पहुंची। 13 मई 1915 को जब सरकार 23 कैवेलरी के सिख जवानों को युद्ध के लिए ले जा रहे थे तो एक ग्रेनेड फटने की घटना हो गई। जांच में पाया गया कि यह ग्रेनेड भाग सिंह नमक सैनिक के सामान में कहीं रखा था। फिर यह भी पता चला कि ये सैनिक गदर पार्टी में शामिल थे। गदर पार्टी में शामिल होने के आरोप में 12 सैनिकों को गिरफ्तार कर लिया गया। इनमें 11 सिख और एक मुस्लमान था। इन्हें मेरठ की छावनी से पकड़ कर डगशाई की इसी जेल में लाया गया। यहां इनका कोर्टमार्शल हुआ और इन्हें इसी जेल में गोली मार दी गई।
इन सैनिकों में, जिन्हें हम कब के भूल चुके हैं, भाग सिंह के साथ मोता सिंह, दफेदार तारा सिंह, इंदर सिंह जोहल, इंदर सिंह शाहजपुर, दफेदार लछमन सिंह, बूटा सिंह, गुज्जर सिंह, जेठा सिंह, बुध सिंह, नंद सिंह और वाधवा सिंह शामिल थे।
अगले लेखों में बात करूंगा डगशाई और इस जेल के कैदियों के बारे में।




